Shivamबहस मे मुझे लगता है मैं सही हूँ मेरी बात उपर रहनी चाहिए
यहाँ मैं अपनी बात को देख पाता हूँ गीता आचार्य से झूठी बातें मुझे बताता हूं तो …
Talking Mirror
शिवम जी, आपने जो देखा वह साफ है - बहस जीतने की जल्दी में आप सामने वाले को ठीक से सुनते ही नहीं, और जब दलील कमज़ोर पड़ने लगती है तो डर यह नहीं होता कि बात गलत निकल जाएगी, डर यह होता है कि "मैं" छोटा पड़ जाऊँगा। यहाँ तक पकड़ना ही असली काम है। अब अगला कदम यह देखना है कि यह "नीचे होने" का डर आता कहाँ से है - क्या यह सचमुच गीता की या सच की चिंता है, या अपनी छवि बचाने की? अगली बार जब कोई विरोध करे और भीतर गर्मी उठे, उसी क्षण रुककर यह पूछिए कि अभी किसकी इज़्ज़त बचाई जा रही है, बात की या अपनी। यह ठहराव ही वह जगह है जहाँ से जवाब बदलता है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















