
मैंने गुरु को पकड़ा, गुरु की किताबों को पकड़ा, और उस व्यक्ति को पकड़ा—जो मेरे लिए गुरु हैं। बस एक पल ठहरकर ईमानदारी से स्वयं को देखा था… और उसी सच्ची नीयत ने मेरा चुनाव कर दिया। चुनाव हमेशा हमारी इच्छा से नहीं होता, हमारी नीयत ही हमें हमारे चुनाव तक ले जाती है। सही नीयत से किया गया चुनाव हमें केवल सही दिशा दिखाता ही नहीं, बल्कि उस दिशा में चलने का साहस भी देता है। भले ही इस ओर आने का फैसला मैंने किया हो, लेकिन यहाँ तक पहुँचाने वाला चुनाव कहीं गहरा था। गुरु ने दिशा दी, गुरु ने दिशा दिखाई, और गुरु ने बार-बार मुझे मेरी ही ओर मोड़ा। अब बात आती है मेरे चुनाव की। क्या मैं देख पा रही हूँ? क्या मैं सच में देखना चाहती हूँ? क्या मैं सही और गलत के बीच नहीं, बल्कि सत्य और अपने भ्रम के बीच चुनाव कर पा रही हूँ? क्या मैं अपने अहंकार को देख पा रही हूँ? क्या मैं स्वयं को देखने की ईमानदारी रखती हूँ? क्योंकि गुरु का मिल जाना पर्याप्त नहीं, गुरु की दिखाई दिशा में चलना ही हमारा चुनाव है। हर पल चुनौतियाँ मिल रही हैं, लेकिन मैं भी अड़ी हूँ— और मेरी चुनौतियाँ भी। पीछे हटना अब विकल्प नहीं है। हारेंगे भी तो लड़कर हारेंगे। गिरेंगे भी तो उठकर चलेंगे। क्योंकि बिना लड़े ही क्या हार, और क्या जीत? जब तक स्वयं को देखने की नीयत जीवित है, तब तक गुरु की दिखाई दिशा भी जीवित है। और शायद यही मेरा सबसे सच्चा चुनाव है— हर बार बाहर नहीं, हर बार स्वयं की ओर लौटना। 🙌🙌



















