ROOPAM KUMARIक्या किसी दूसरे का भविष्य धीरे-धीरे हमारे अपने जीवन का आधार बन सकता है?
नहीं, क्योंकि , दूसरे के भविष्य को हमने यदि जीवन का आधार बनाया…
Talking Mirror
रूपम जी, आपने जो पकड़ा है वह बहुत साफ़ है, टेक जाने पर सहारा नहीं, सहारे की ज़रूरत रखने वाला ही हिल जाता है। और यह भी ठीक देखा कि दूसरे का भविष्य आधार बनाया तो दूसरे की कामना का खतरा हमेशा बना रहता है। एक बात इसी में और झलकती है। मिसेज़ थर्लो का सहारा टूटा किसी और के कारण, पति के फैसले से, बेटों के फैसले से। लेकिन अपने भीतर देखिए, जब हम खुद किसी सहारे को त्यागने का फैसला लेते हैं, वह सहारा टूटता है या हम उसे तोड़ते हैं, दोनों हालत में वही अहंकार हिलता है जो सहारे पर टिका था। फ़र्क सिर्फ़ यह है कि यहाँ टूटन हमारे हाथ में लगती है, इसलिए दर्द नहीं, समझ जैसी लगती है। पर उत्तर हिलना, दोनों जगह बराबर सच है।


















