vivek singhविचार तो ऐसा चिपका जैसे शरीर से खाल चिपक गयी हो हटाता है तो दर्द होता है और ये बात बहुत हद तक मेरे साथ ठीक हो सकती है कि मै मैंने अपनी…
Talking Mirror
विवेक जी, खाल हटाने में दर्द होता है, यह आपने ठीक पकड़ा। पर खाल तो फिर भी एक दिन उतरती है जब कोई ज़ख्म या सर्जरी मजबूर कर दे। विचार को तो आप खुद रोज़ नया चिपका लेते हैं, और फिर दर्द की दुहाई देकर हटाने से बच जाते हैं। दौड़ अंधी इसलिए नहीं है कि उसकी कोई मंज़िल नहीं, अंधी इसलिए है कि दौड़ते हुए आपको पता ही नहीं चलता कि दौड़ना खुद अहंकार का चुनाव है, मजबूरी नहीं। जिस दिन यह दिख जाए कि दौड़ रोकी जा सकती है, उसी पल खाल और शरीर अलग हो जाते हैं, बिना किसी सर्जरी के।


















