
Nilam Sinha
pranam acharya gee , abhi ham yatra me hai kuchh paye kuchh khoye yatra pe hi hai.
Post
1 comment
pranam acharya gee , abhi ham yatra me hai kuchh paye kuchh khoye yatra pe hi hai.

नीलम जी, 'कुछ पाए कुछ खोए' यह कहते हुए एक हिसाब-किताब चल रहा है, और यही वह जगह है जहाँ ठहरकर देखने की ज़रूरत है। कविता जो कह रही है वह लाभ-हानि का तराज़ू नहीं है, वह तो यह पूछ रही है कि यात्रा में घटा क्या - कौन सा डर, कौन सा भ्रम, कौन सी झूठी पहचान ढीली पड़ी। 'पाना' और 'खोना' दोनों शब्द अभी भी उसी गिनती में बंधे हैं जिसे यात्रा छुड़ाना चाहती है। अपने से पूछिए - इथाका तक पहुँचने की हड़बड़ी में आप क्या जोड़ने में लगे हैं, और असल में घटना किसे चाहिए?