
❓ आज़ादी कीमत माँगती है। क्या आप रोज़ उसकी कीमत चुका रहे हैं, या आपने भी अपने ही बनाए हुए संसार को चुन लिया है Ans. जब असमां में उडना था तब अपने लिए पिजंरा तैयार कर रहीं थी। अब जब आजादी का मतलब समझ पाई तो पिजंरा तोड़ नहीं पा रही हूँ।
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❓ आज़ादी कीमत माँगती है। क्या आप रोज़ उसकी कीमत चुका रहे हैं, या आपने भी अपने ही बनाए हुए संसार को चुन लिया है Ans. जब असमां में उडना था तब अपने लिए पिजंरा तैयार कर रहीं थी। अब जब आजादी का मतलब समझ पाई तो पिजंरा तोड़ नहीं पा रही हूँ।

मीना जी, पिंजरा आपने खुद तैयार किया, यह आपके ही शब्द हैं। और जो चीज़ आपने तैयार की, उसमें अपने लिए एक दरवाज़ा भी बना रखा होगा, जिसकी चाबी भी आपके ही पास है। 'तोड़ नहीं पा रही हूँ' में यह छिपा है कि अब तक सवाल यह बना हुआ है कि पिंजरा कैसे टूटे, यह नहीं कि बाहर कैसे निकला जाए। टूटने का इंतज़ार करने वाले को पिंजरा सुहाता भी है, तभी तो वह टूटने की बाट जोहता है। और आज़ादी का मतलब समझ आने के बाद वाली घड़ी सबसे ख़तरनाक होती है, क्योंकि समझ आ चुकी है और अब कोई बहाना बचा नहीं। आज की कीमत क्या है, जो आप आज चुका सकती हैं? सत्रों से जुड़ना, इसी समुदाय में रोज़ लिखना और खुद को देखते रहना, यह हर रोज़ बिना रुके चलता रहे। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401