Madhavi sahuमैं भी बच्चे आने से पहले तैयारी कर रही थी लेकिन अब अपने पति को पटवारी के पद पर दिन भर भ्रष्टाचारी व्यस्था के बीच पिसते हुए देखती हूं और…
माधवी जी, पति को रोज़ उस व्यवस्था में पिसते देखकर आपने उस गड्ढे का पूरा नक्शा देख लिया है, और फिर भी आखिरी पंक्ति में लिखा है कि कोने में पद और सम्मान की चाह अभी जिंदा है। यह दूसरी पंक्ति पहली को आधा झुठला देती है। संशय की पूरी वजह भ्रष्टाचार और नियमों की जकड़न है, यानी पद की चमक में जो दाम छिपा था वह दिख गया। पर चाह तब भी बुझी नहीं, क्योंकि वह चाह काम की थी ही नहीं, पहचान की थी। काम को इतने पास से देखने के बाद भी जो बचा रहे, वह काम से नहीं, अपने बारे में मिलने वाली ऊँची तस्वीर से जुड़ा होता है। अब सवाल उस संशय का नहीं है कि गड्ढे में जाऊँ या नहीं, सवाल यह है कि वह तस्वीर किसकी माँग है और उसे किसने सिखाया कि जीने लायक होने के लिए किसी पद की रसीद चाहिए। इसे और साफ़ देखने के लिए आचार्य जी के सत्रों और रिकॉर्डिंग्स में उतरिए।


















