Nandani Koshleआज मै पुरे 14 महीनों के बाद duty rejoining के लिए गयी थी, वहाँ एक चीज हुयी, मैंने अपने एप्लीकेशन मे लिखा था के road traffic accident के…
नंदनी जी, ध्यान से देखिए कि फैसला सही था या गलत, यह आज इसलिए तय हो रहा है क्योंकि रैंक अच्छी नहीं आई। अगर रैंक ठीक आ जाती, तो वही पाँच महीने, वही थका हुआ शरीर, वही फैसला - आपको बिलकुल सही लगता। मतलब फैसले की सच्चाई नतीजे से नापी जा रही है, अपनी नीयत से नहीं। जिस दिन लिया था, शरीर की हालत देखकर लिया था, यह तथ्य आज भी उतना ही सच है जितना उस दिन था। अब जो हो रहा है वो पछतावा नहीं, तुलना है - दोस्तों की रैंक गिनने से जो तकलीफ शुरू हुई, वही अब फैसले पर शक बनकर बैठ गई है। और medicolegal cases से जो अरुचि है, उसे भी इसी उधेड़बुन से अलग करके देखिए - क्या वह काम सच में भारी लगता है, या अभी मन उस दिन की हार का हिसाब बराबर करने में उलझा है जिसकी वजह से हर चीज़ बोझ जैसी लग रही है।


















