
Sumit Gupta
सच जानना है चाहे मान्यताएं क्यों न टूटे
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सच जानना है चाहे मान्यताएं क्यों न टूटे

सुमित जी, यह कहना आसान है और सुनने में भी बहुत उम्दा लगता है, पर असली परीक्षा तो तब होती है जब कोई आपकी ही किसी प्यारी मान्यता पर उंगली रखे। उस क्षण आपका मन क्या करता है, यह देखना ज़रूरी है — क्या वह तुरंत स्वीकार करता है, या सफ़ाई देने लगता है, या सामने वाले की बात को ही तोड़-मरोड़कर एक आसान निशाना बना देता है? पिछली किसी बहस को याद कीजिए जहाँ आप हारते दिख रहे थे — वहाँ आपने सच को चुना था या अपनी जीत को? जवाब शब्दों में नहीं, उस याद में मिलेगा।