Mohish Maheshwariप्रश्न: किस मौके पर आपने भीतर डरते हुए भी बहुत कॉन्फिडेंट दिखने की कोशिश की थी?
उत्तर: उन सभी मौकों पर जहां मुझे अपनी पहचान(मैं बहुत अ…
मोहिश जी, दोनों उदाहरणों में एक ही चीज़ पकड़ में आ रही है - 'हाँ' कहना या 'मुझे मालूम है' दिखाना, असल में जवाब देना नहीं है, बस छवि को गिरने से बचाना है। दफ्तर में तथ्य पकड़कर बात बना देना, और घर में बिना किए 'हाँ' बोल देना - दोनों जगह सच बोलने से ज़्यादा ज़रूरी यह लगा कि 'मैं जानकार हूं', 'मैं जिम्मेदार हूं' यह छवि बनी रहे। और मज़ेदार बात यह है कि इस तरीके से छवि बचती नहीं, बाद में काम न होने पर या जानकारी गलत निकलने पर वही छवि और बुरी तरह टूटती है। अगली बार जब ऐसा कोई सवाल आए, वहीं रुककर देखिए - उस पल 'नहीं मालूम' या 'नहीं किया' कहने में ठीक क्या खोने का डर लग रहा है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















