Priya Han,ham aaj tak Nahi samjh paye ki system hame chalata hai ya ham system ko ,lakin aachary Ji Se Judne ke baad dheere dheere samjh aa R…
प्रिया, आपने खुद लिखा कि पहचान कोई और तय करता था और अब आप एक नई पहचान बनाना चाहती हैं जो निस्वार्थ हो, प्रेम और समर्पण वाली। गौर करें, यहाँ भी वही ढांचा है, बस सामान बदल गया है, पहले दूसरे तय करते थे कि मैं क्या हूँ, अब मैं खुद तय कर रही हूँ कि मैं क्या बनूँगी, निस्वार्थ, प्रेमी, समर्पित। टायलर डर्डन ने भी यही किया था, व्यवस्था के खिलाफ एक नई, ऊँची पहचान खड़ी कर ली थी। सवाल पहचान बदलने का नहीं है, चाहे वो पहचान कितनी भी अच्छी सुनाई दे। सवाल यह है कि क्या अब भी कोई है जो खुद को कुछ बनाना चाहता है, या बनना खुद ही गिर रहा है। निस्वार्थ होने की चाह भी एक चाह है, और जहाँ चाह है वहाँ चाहने वाला बचा हुआ है। इसी बिंदु को सत्रों में और गहराई से देखा जा सकता है, वहाँ जाकर इस फर्क को और साफ देखिए।


















