
उस दिन सत्र में जब देखा तो लगा दगा कबूतरों ने दिया, पर क्या सच में अपनी गलती कबूतरों पर थोप देना सही है, वो चिड़िया है अपनी प्रकृति से बंधी है, पर क्या हमारी और उसकी तुलना करके खुद को हम दोषी नहीं है।
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उस दिन सत्र में जब देखा तो लगा दगा कबूतरों ने दिया, पर क्या सच में अपनी गलती कबूतरों पर थोप देना सही है, वो चिड़िया है अपनी प्रकृति से बंधी है, पर क्या हमारी और उसकी तुलना करके खुद को हम दोषी नहीं है।

निवेदिता जी, कबूतर की तुलना यहाँ एक औज़ार भर है, निर्णय नहीं। कबूतर सच में दोषी नहीं है क्योंकि वह प्रकृति से बंधा है, उसके पास चुनने का विकल्प ही नहीं। सवाल यही है कि क्या आपके पास विकल्प था या नहीं। अगर पिंजरे में बैठे रहना आपकी प्रकृति की मजबूरी थी तो दोष का सवाल ही नहीं उठता, पर अगर जानते हुए कि कोई मदद माँग रहा है, आपने सुविधा चुनी, तो वहाँ तुलना करना बहाना नहीं बल्कि आईना है। इसलिए असली सवाल यह नहीं कि कबूतर पर दोष डालना ठीक है या नहीं, बल्कि यह कि आपके भीतर उस पल पर दोबारा लौटकर देखना है कि वहाँ चुनाव मौजूद था या सचमुच मजबूरी।