
मैं दगाबाज़ हूँ, ख़ुद का, जिसकी वजह से ही मैं आचार्य जी के साथ भी दगाबाज़ी करता हूँ। हाँ, मैं दगाबाज़ हूँ, क्योंकि— मैं एक्टिविटीज़ में पूरी तरह से भाग नहीं लेता। मैं लाइव सेशन्स में अटेंटिव नहीं रहता। मैं एग्ज़ाम की पूरी तरह तैयारी नहीं करता। मैं समय पर योगदान नहीं दे पाता। मैं लाइव सत्रों में पार्टिसिपेट नहीं कर पाता। ये सब जो ऊपर लिखा है, जो है, वो है। इसमें मेरी मजबूरी का रोना और मक्कारी, सब दिख सकती है। इन सबमें सिर्फ़ एक बात अच्छी है कि मैं ख़ुद को देख पा रहा हूँ, कि मैं कितना दगाबाज़ हूँ। धन्यवाद, आचार्य जी। 🙏🏻



















