
मेरे घरवाले मुझे पुस्तकें खरीदने देते हैं। गीता-सत्र में जुड़ने में थोड़ी कठिनाई होती है, लेकिन किसी न किसी प्रकार मैं जुड़ जाता हूँ। परंतु पुस्तकों का भी यही हाल है कि मैंने उन्हें बहुत समय से पढ़ा नहीं है। बस उन्हें एकत्र करके रखता गया हूँ और अब उन पर धूल जम रही है। कभी मुड़कर उनकी ओर देखता भी नहीं हूँ। मुझे पता नहीं कि मुझे आगे क्या-क्या सीखना है, इसलिए मैंने सब कुछ मँगवा लिया है। शायद ऐसा इसलिए किया है ताकि मेरे भीतर के अहंकार को यह भय न रहे कि मैं कहीं पीछे न छूट जाऊँ। वह ‘मैं’, जो वास्तव में समाज द्वारा निर्मित एक मिथ्या आत्म-रचना है, हर समय आगे बढ़ते रहने और पीछे न रह जाने की चिंता में लगा रहता है। गीता-सत्र भी मुझे उपलब्ध होते रहे हैं, लेकिन मैं उनका भी पूर्ण उपयोग नहीं कर पा रहा हूँ। कभी-कभी लगता है कि मैं वास्तव में ज्ञान एकत्र नहीं कर रहा, बल्कि केवल शब्द और आँकड़े एकत्र कर रहा हूँ। बस यह संख्या बढ़ती जा रही है कि मैंने इतनी पुस्तकें पढ़ीं, इतना कुछ जाना और इतना कुछ सीख लिया। परंतु उस ज्ञान को समझने, आत्मसात करने और अपने जीवन में उतारने का प्रयास उतना नहीं हो रहा। शायद मैं ज्ञान प्राप्त करने से अधिक केवल ज्ञान का संग्रह कर रहा हूँ।



















