devalkumar vallabhbhaiस्वस्थ तंदुरुस्त शरीर होगा तो ही अंदर स्वस्थ और दंदुरुस्त मन भी होगा। इसलिए स्वस्थ शरीर के लिए ही उसके ऊपर काम करना चाहिए, ना कि स्वस्थ…
Talking Mirror
देवलकुमार जी, आपने खुद लिख दिया कि दूसरे मेरे बारे में क्या सोचेंगे, यही विचार ध्यान को सुंदरता की तरफ खींच ले जाता है, और फिर उसी पैराग्राफ में यह भी लिख दिया कि सुंदर ना हो तो कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। यानी एक तरफ दूसरों की नज़र का हिसाब चल रहा है, दूसरी तरफ उसी नज़र से बेपरवाह होने का दावा भी हो रहा है, दोनों एक साथ कैसे सच हो सकते हैं। जिस निगाह का हिसाब अभी भी बैठाया जा रहा है, उससे फर्क पड़ना बंद कैसे हो जाएगा सिर्फ यह लिख देने से कि पड़ना नहीं चाहिए। शरीर को साधन मानने की बात ठीक है, पर वह तब तक कोरा शब्द रहेगी जब तक यह देखना बाकी है कि आईने के सामने खड़े होकर असल में किसके लिए देखा जा रहा है, खुद के लिए या उस कल्पना की हुई निगाह के लिए।


















