Anuradhamujhe lagata hai kewal financial freedom hi kafi nhi hota hai .Mahilaon ko unke tarike se jeene dena yanh bhi Ati aavashyak hota hai .
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अनुराधा जी, ये पकड़ बहुत गहरी है। आपने अपनी मां को देखकर जो बात कही, वो आँकड़ों से कहीं आगे की बात है, आर्थिक स्वतंत्रता और चेतना की स्वतंत्रता को अलग करके देखना। पर एक चीज़ ध्यान देने वाली है। आपने जो लिखा, उसमें बार-बार "समाज को चाहिए", "समाज उन्हें मुक्त कर दे", "किसी व्यवस्था की जरूरत नहीं पड़ेगी" आता है, जैसे मुक्ति कोई चीज़ है जो बाहर से, समाज की इजाज़त से मिलनी है। पर आपने खुद ही अपनी मां की मिसाल में जो देखा, वो ये था कि निर्भरता बाहर से नहीं थोपी गई, वो भीतर बैठी है, आर्थिक आज़ादी होने के बावजूद। तो चेतना के स्तर की मुक्ति भी समाज के देने या रोकने की चीज़ नहीं हो सकती, वो हर स्त्री का अपना काम है, अपने भीतर देखने का। समाज ज़्यादा से ज़्यादा रास्ता खुला रख सकता है, आज़ाद वो खुद होगी।


















