
🙏🏼 आचार्य जी, FOMO हो रही है… आज सिक्किम आए हुए 9 दिन हो गए। बेटे के एडमिशन के लिए आई थी, लेकिन जब उसे हॉस्टल में सामंजस्य बैठाने में कठिनाई हुई, तो कुछ दिन यहीं रुकने का निर्णय लिया। इसी बीच Weekend with Master सत्र भी था। ऑनलाइन जुड़ी तो रही, लेकिन वैसी एकाग्रता नहीं ला पाई जैसी सामान्यतः रहती है। उधर गीता प्रतिभागियों को HIDP कार्यक्रम करते देख मन में बार-बार एक कसक उठती रही—जैसे कोई बहुत महत्वपूर्ण चीज़ छूट रही हो। तभी मन में विचार आया—क्यों न आचार्य जी की पुस्तक का ही सहारा लिया जाए? मैंने Truth Without Apology की अपनी प्रति निकाली और बेटे के साथ बैठकर पढ़ना शुरू किया। वह भी पूरे ध्यान से सुनता रहा। तभी लगा कि शायद इस समय मेरी साधना का स्वरूप यही है। इस समय HIDP में उपस्थित होने से अधिक आवश्यक, अपने ही घर में सत्य की एक छोटी-सी लौ जलाना है। यह पुस्तक अब मैं बेटे के पास ही छोड़ जाऊँगी। अपने लिए दूसरी मँगवा लूँगी। यदि इस पुस्तक का साथ उसके भीतर सत्य के प्रति थोड़ी भी जिज्ञासा जगा दे, तो इससे बड़ी उपलब्धि मेरे लिए और क्या होगी?🙏🏼




















