Khushboo Upadhyayhum aaj bhi dusron ki di gayi pahchan pr ji rahe hain .
or main is vakt main apne sath spst dekh pa rahi hun. pr main us jal ko tod nh…
खुशबू जी, यही तो साफ देखना है, आप उसी क्षण को पकड़ पा रही हैं जहाँ जाल टूटता नहीं। आप कह रही हैं कि दिख तो रहा है, पर भविष्य की सोच और लोगों की राय आकर बीच में खड़ी हो जाती है। ध्यान दीजिए, यह ठीक वही जंजीर है जिसकी बात महादेवी वर्मा कर रही थीं, बस अब इसका रूप बदल गया है। पहले समाज कहता था स्त्री ऐसी होनी चाहिए, अब मन खुद ही किसी के पॉजिटिव या निगेटिव जवाब को अपनी दिशा तय करने का आधार बना लेता है। सांचा बाहर से नहीं, अब भीतर से मिल रहा है। कोशिश जारी रहना अच्छी बात है, पर असली सवाल यह है कि जिस दिशा पर चलना है, वह किसी की राय के हिसाब से तय हो रही है या अपने साफ देखे हुए के हिसाब से। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















