
✍🏻 पोस्ट 1 | 21 सितंबर '26 💭 विषय — पर्यावरण और जलवायु ───────── 🏔️ हिमालय के पिघलते ग्लेशियर और बढ़ता जल संकट हम अक्सर हिमालय को बर्फ़ से ढके पहाड़ों की तरह देखते हैं। लेकिन यही ग्लेशियर एशिया की बड़ी नदी प्रणालियों के लिए प्राकृतिक जल-भंडार का काम करते हैं। सितंबर 2026 में जारी Systemiq के आकलन के अनुसार, हिमालयी ग्लेशियरों का द्रव्यमान एक दशक पहले की तुलना में 65% तेज़ी से घट रहा है। 💧 लेकिन ग्लेशियर पिघलने का अर्थ तुरंत पानी कम होना नहीं है। शुरुआत में तेज़ पिघलाव से नदियों में अतिरिक्त पानी पहुँच सकता है। लेकिन ग्लेशियर लगातार छोटे होते जाएँ, तो एक समय के बाद उनसे मिलने वाला पानी भी घटने लगता है। इस अधिकतम प्रवाह-बिंदु को ‘पीक वॉटर’ कहा जाता है। आकलन के अनुसार, हिमालय की अधिकांश नदी घाटियाँ मध्य शताब्दी तक इस अवस्था की ओर बढ़ सकती हैं। ⚠️ खतरा केवल भविष्य में पानी कम होने का नहीं है। ग्लेशियरों के पीछे हटने से हिमनदीय झीलें बन सकती हैं। यदि ऐसी झीलों के प्राकृतिक बाँध टूटें, तो अचानक हिमनदीय झील विस्फोटक बाढ़ (GLOF) आ सकती है। भारत में लगभग 200 उच्च-जोखिम वाली हिमनदीय झीलें चिन्हित हैं, जिनमें 56 अत्यधिक जोखिम वाली हैं। 🔭 फिर सवाल है: हम इस बदलाव को कितना देख पा रहे हैं? हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में अनुमानित लगभग 40,000 ग्लेशियरों में से केवल करीब 21 की विस्तृत और लगातार जमीनी निगरानी होती है। उपग्रहों से निगरानी व्यापक है, लेकिन इतनी बड़ी और तेजी से बदलती व्यवस्था में जमीनी जानकारी का यह अंतर जोखिमों को समझने की चुनौती दिखाता है। 🌫️ और कहानी सिर्फ़ पहाड़ों की नहीं है। Systemiq के अनुसार, हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने में लगभग एक-तिहाई योगदान काले कार्बन का हो सकता है। मैदानों से उठने वाला यह काला कार्बन बर्फ़ पर जमकर सूर्य की ऊर्जा के अवशोषण को बढ़ाता है। ईंट भट्ठे इसके प्रमुख स्रोतों में हैं। 🇮🇳 हिमालय भारत के लगभग 18% भू-भाग से जुड़ा है और रिपोर्ट के अनुसार हिमालयी जल भारत की 20% से अधिक GDP को सहारा देने वाली आर्थिक गतिविधियों का आधार है। 🪞 लेकिन यहाँ सवाल आँकड़ों से थोड़ा आगे जाता है। हम पानी, ऊर्जा, भोजन और आर्थिक लाभ का हिसाब रखते हैं। लेकिन जिस प्राकृतिक व्यवस्था से यह लाभ लगातार मिलता रहा, उसका हिसाब कहाँ दर्ज होता है? जब तक हिमालय देता रहता है, वह पृष्ठभूमि में रहता है। जब वही व्यवस्था कमजोर होने लगती है, तब वह “संकट” बनकर दिखाई देती है। क्या हम किसी चीज़ को तभी देखते हैं, जब उसमें अपना लाभ, अपनी हानि या अपना डर दिखाई देने लगे? और अगर हमारी नज़र लाभ पर ही टिकती रहे, तो जिस आधार से लाभ मिल रहा है, वह हमारी नज़र से क्यों छूट जाता है?_ 💭 हिमालयी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का सबसे बड़ा दीर्घकालिक खतरा क्या है? A. नदियाँ सूख जाएँगी B. जल-सुरक्षा घटेगी C. बर्फ़बारी बढ़ेगी D. झीलें समाप्त होंगी 📌 स्रोत: The Hindu https://www.thehindu.com/sci-tech/energy-and-environment/himalaya-approaching-tipping-point-report-says/article71467426.ece













































