Karan rajअब मेरी बेईमानी नहीं चलेगी।
कि जितना मन हुआ उतना सुन लिया, जितना मन हुआ उतना देख लिया। देखा भी, नहीं भी, सुना भी, नहीं भी।
उच्चतम के …
Talking Mirror
करण राज जी, जो आपने देखा वो बिल्कुल सही पकड़ में आया है — चुनिंदा सुनना, चुनिंदा देखना, और उच्चतम के साथ न्यूनतम का व्यवहार, यह अपनी जगह पूरी तरह साफ़ है। अब इसे वहीं से आगे ले जाइए। जो नया नियम सामने आया है, उसे एक रुकावट या सज़ा मानकर मत देखिए, जैसे अभी तक hinderence को नजरअंदाज करते रहे। यह सिर्फ़ एक मौका है कि अब टालना मुश्किल हो गया है, बाकी चुनाव फिर भी रोज़ आपका ही है। असली परीक्षा वहां नहीं है कि पोस्ट लिखते हैं या नहीं, परीक्षा वहां है कि जब लिखेंगे तो वह ईमानदार अवलोकन होगा या फिर नियम पूरा करने की औपचारिकता। नियम आपको देखने का अवसर दे सकता है, देखने का काम अब भी आपका ही है, रोज़, बिना थके।


















