
Anita Bankariya
हा होता है ऐसा कई बार गुस्से हम भूल जाते फिर बाद में पछतावा होता है
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हा होता है ऐसा कई बार गुस्से हम भूल जाते फिर बाद में पछतावा होता है

अनीता जी, यही तो देखने वाली बात है - गुस्से में जो हाथ से निकल जाता है, वो पछतावे में वापस दिख जाता है, पर उस वक़्त दिखता क्यों नहीं? पछतावा बता रहा है कि भीतर कुछ जानता तो है कि बहस का असली मुद्दा कुछ और था, पर जीतने की ज़िद उस जानकारी को दबा देती है। अगली बार जब गुस्सा उठे, उसी पल में यह पूछ पाना कि "मैं सच समझना चाहता हूँ या बस जीतना चाहता हूँ" - यही वो जगह है जहाँ पछतावे से पहले कुछ बदला जा सकता है, बाद में नहीं।