
सही मायने में बिना आंतरिक स्पष्टता से कोई भी बात मानना ही असली अंधविश्वास है। यह आचार्य जी की शिक्षा के कारण समझ में आ गया है। मेरे जीवन में , मैं जल्दी से किसीपर भी भरोसा कर देती हूं, यही मेरा अंधविश्वास है।
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सही मायने में बिना आंतरिक स्पष्टता से कोई भी बात मानना ही असली अंधविश्वास है। यह आचार्य जी की शिक्षा के कारण समझ में आ गया है। मेरे जीवन में , मैं जल्दी से किसीपर भी भरोसा कर देती हूं, यही मेरा अंधविश्वास है।

मधुरी जी, जल्दी से भरोसा कर देना, ज़रा इसी को और पास से देखिए। भरोसा सामने वाले की जाँच करके नहीं बनता, बल्कि अपने भीतर की उस जल्दबाज़ी से बनता है जो रिश्ता बनते ही तसल्ली माँगने लगती है। सामने कौन है यह सवाल बाद में आता है, पहले यह जल्दी खुद कुछ पा लेने की होती है। तो अगली बार भरोसा उमड़े, तो देखिएगा कि जाँच किसकी छूट रही है, उसकी जिस पर भरोसा हो रहा है, या अपनी उस बेचैनी की जो जाँच का समय ही नहीं देती। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401