
✍🏻 पोस्ट 3 | 11 अक्टूबर '26 💭 विषय — पर्यावरण और जलवायु ───────── 🌍 जलवायु संकट से बड़ा ख़र्च, उससे निपटने में देरी! 🤔 कल्पना कीजिए, दो देशों के सामने दो ख़तरे हैं। एक तरफ़ युद्ध और रक्षा का ख़र्च है, तो दूसरी तरफ़ जलवायु परिवर्तन से आने वाली आपदाएँ। दोनों से निपटने के लिए पैसा चाहिए, लेकिन क्या हम संकट आने से पहले तैयारी करने पर उतना ख़र्च करते हैं, जितना संकट आने के बाद उसकी भरपाई में करना पड़ता है? 🌏 अक्टूबर 2026 में फ़िजी के नादी में हुए जलवायु सम्मेलन-पूर्व शिखर सम्मेलन में तुर्किये के जलवायु मंत्री और COP31 के अध्यक्ष-नामित मुरात कुरुम ने इसी सवाल पर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि अमीर देशों को जलवायु कार्रवाई पर नाटो देशों द्वारा रक्षा पर GDP का 5% ख़र्च करने की प्रतिबद्धता से भी कहीं अधिक ख़र्च करना चाहिए। उनका तर्क था कि आपदाओं से पहले कार्रवाई करना, उनके बाद हुए नुक़सान की भरपाई करने से सस्ता पड़ता है। ❓ लेकिन क्या सवाल सिर्फ़ इतना है कि दुनिया सुरक्षा पर इतना ख़र्च करने को तैयार है, तो जलवायु संकट से निपटने के लिए वैसी तत्परता क्यों नहीं दिखती? क्या हम एक अधूरा सवाल नहीं पूछ रहे हैं? हम सरकारों से जलवायु संकट पर ख़र्च करने की माँग तो करते हैं, लेकिन क्या अपनी उन इच्छाओं और जीवनशैली पर भी सवाल उठाते हैं, जो प्रकृति के लगातार दोहन को बढ़ावा देती हैं? 🌿 अगर विकास की हमारी धारणा और उपभोग की हमारी कामना पर सवाल नहीं उठता, तो क्या केवल ज़्यादा पैसा ख़र्च करके हम उस संकट को रोक पाएँगे, जिसे पैदा करने में हमारे जीने का तरीक़ा भी शामिल है? 🧐 जलवायु परिवर्तन से जुड़ी ख़बरों को देखते हुए आपको क्या लगता है? कोई जलवायु संकट से हुए नुक़सान के मुआवज़े की माँग करता है, तो कोई बेहतर नीतियों की। लेकिन वह कौन-सी एक चीज़ है, जिसकी बात करने से हम सब बचते हैं? स्रोत: https://www.theguardian.com/environment/2026/oct/09/cop31-host-wealthy-countries-climate-crisis-spending-defence-nato














































