
मैं दूसरे के साथ कभी दगाबाजी तो नहीं की हूँ, जब किसी की मेरी जरूरत थी मैं साथ थी | अभी मुझे लगता है अपने आप से दगाबाजी कर रही हूँ |
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मैं दूसरे के साथ कभी दगाबाजी तो नहीं की हूँ, जब किसी की मेरी जरूरत थी मैं साथ थी | अभी मुझे लगता है अपने आप से दगाबाजी कर रही हूँ |

निशु जी, यह देखना ज़रूरी है कि यह दगाबाज़ी ठीक किस जगह हो रही है। दूसरों के साथ खड़े रहना आसान साबित हुआ, पर अपने लिए वही साहस, वही समय, वही प्राथमिकता नहीं जुट पा रही। अक्सर यही पैटर्न होता है - दूसरे की ज़रूरत पूरी करना एक पहचान बन जाता है, सुरक्षित भी, सराहा भी जाता है, जबकि अपने भीतर जो माँग उठती है उसे सुनना असुविधाजनक लगता है, इसलिए टाला जाता है। ज़रा देखिए कि अपने साथ दगाबाज़ी कहते हुए असल में आप किस चीज़ को नज़रअंदाज़ कर रही हैं - कोई निर्णय, कोई सच्चाई, कोई काम जो आप जानती हैं कि करना है पर टाल रही हैं? वह जगह पहचानिए, नाम दे दीजिए, वहीं से शुरुआत होगी।