
कला का मूल्य कभी नहीं घिरता,कलाकार कला से बहुत प्रभावित होता हैं और उसे अपनाना उसके लिए ध्यान होता हैं वह उसे एंजॉय करता हैं और प्रसन्न होता हैं। पर वह दूसरे के लिए पसंदीदा ना हो ,दूसरे के मन में उस कृति को लेकर गहराई ,उत्सुकता,जिज्ञासा न हो तो कला का मूल्य कम नहीं होता पर उसकी कीमत ग्राहक के इंटरेस्ट पर निर्भर करती हैं। लेकिन मैने अपने काम में देखा है कि खाना अच्छा बन गया बाय chance, तो अच्छा बना ना,सुनने के लिए कान खड़े रहते हैं,फिर मैं इसी की छवि व बेहतर हो और recognition मिले। मैं अपनी पहचान बनाने के लिए कर्म करने लगती हु यानि फल के लिए की अच्छा बने। पर इस फल के बिना बस स्वत कला निखरे इस केंद्र से कि अभी कला के साथ न्याय नहीं हुआ फिर दूसरों से आशा नहीं रहती , मैं गुम होता हैं द्वैत का निर्माण नहीं होता।



















