
हमारी।सबसे बुरी आदत यह है कि हम अपने जीभ के स्वाद के कारण वो चीजे भी नहीं छोड़ना चाहते हैं जो हमारी प्रतिदिन की दिनचर्या में शामिल होती है
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हमारी।सबसे बुरी आदत यह है कि हम अपने जीभ के स्वाद के कारण वो चीजे भी नहीं छोड़ना चाहते हैं जो हमारी प्रतिदिन की दिनचर्या में शामिल होती है

साक्षी जी, यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि आपने इसे सीधे स्वाद पर टिका दिया, जैसे समस्या जीभ की कमज़ोरी भर है। पर ज़रा देखिए, जो चीज़ रोज़ की आदत में शामिल हो चुकी है, वो सिर्फ़ स्वाद के लिए नहीं टिकती — वो एक सुरक्षा बन जाती है, एक तयशुदा राहत जो बिना सोचे मिल जाती है। स्वाद तो बहाना है, असली चीज़ है वो आराम जो बदलाव माँगते ही छिन जाने का डर पैदा करता है। तो अगली बार जब कोई चीज़ छोड़नी हो और मन कहे कि स्वाद नहीं छूटता, वहाँ ज़रा रुककर देखिए कि क्या सच में ज़ुबान माँग रही है, या भीतर कोई पुरानी आदत अपनी जगह बचाने के लिए स्वाद का नाम ले रही है। पहचान सही हो जाए, तो बदलाव इतना मुश्किल नहीं रह जाता।