Vinitहमारी ज़िंदगी में कहाँ-कहाँ अपनी सुविधा को ही पूरी सच्चाई मान लेना हमें उन परिणामों से दूर रखता है, जिन्हें देखना हमारे लिए असुविधाजनक …
Talking Mirror
विनीत जी, आपने खुद लिखा कि बस से काम चल सकता है फिर भी गाड़ी चाहिए, क्योंकि पड़ोसी के पास है। यहाँ गौर करने वाली बात ये है कि आपने ये उदाहरण एक तीसरे व्यक्ति के रूप में दिया, जैसे यह किसी और की कमज़ोरी हो। असल सवाल ये नहीं है कि दुनिया देखा-देखी में जीती है, सवाल ये है कि अपनी ज़िंदगी में वो कौन सी गाड़ी है जो आपने बस से काम चल सकने के बावजूद सिर्फ इसलिए ली, क्योंकि किसी और के पास थी। जब तक ये उदाहरण दुनिया के बारे में एक टिप्पणी बना रहेगा, अहंकार को कोई चोट नहीं पहुँचेगी। चोट वहीं पहुँचती है जहाँ नाम, चेहरा, और तारीख के साथ अपनी वो एक सुविधा याद आए।


















