
HIDP मेरे लिए तो सच में मुश्किल था गीता सत्रों के बिना जीना। वो जीवन जीना नहीं था, बस ढो रही थी, बोझ, और मजबूरी में पकड़ी हुई जिम्मेदारियों को। HIDP में आकर पता चलता है कि कितने ज्यादा बंधन में थे, कितने गहरे कीचड़ में धंसे थे हम। अपनी कमजोरियां साफ साफ देख पाते हैं।। आचार्य जी आपकी मेहरबानियां बढ़ती ही जा रही है। पहले आपने इतने ग्रंथों को इतने व्यावहारिक तरीके से आसान कर के समझाया हमें, फिर हमें गीता कम्युनिटी भी दे दी, जिसमें हम खुल कर अपने मन की बाते लिख सकते हैं। फिर स्पष्टता लाने के लिए हमें AP MIRROR दे दिया। और अब HIDP में आकर तो जैसे पारस पत्थर मिल गया हमें। जिसमें हम निखरते ही जा रहे हैं। 🙏🙏





















