
1. वेदांत में सत्य की ओर इशारा करने वाले 50 शब्द और उनमें सकारात्मक (via-positiva) शब्द वेदांत में परम सत्य को किसी वस्तु की तरह परिभाषित करना कठिन माना गया है। इसलिए उपनिषदों और वेदान्तिक परंपरा में सत्य की ओर संकेत करने के लिए कभी सकारात्मक शब्दों का, तो कभी नकारात्मक भाषा का प्रयोग मिलता है। सत्य की ओर संकेत करने वाले 50 शब्द/पद: ब्रह्म आत्मा आत्मन् सत्य सत् चित् आनंद सच्चिदानंद अद्वैत आत्मज्ञान ब्रह्मज्ञान ज्ञान चैतन्य प्रज्ञान शुद्ध चैतन्य शुद्ध आत्मा परमात्मा पुरुष तत्त्व परब्रह्म अक्षर अविनाशी नित्य शाश्वत अनंत पूर्ण अखंड अकर्ता अभोक्ता निर्गुण निराकार निरुपाधिक असंग निर्विकार निष्कलंक निर्मल अमृत अजन्मा अभय कैवल्य मोक्ष मुक्ति शांति तुरीय साक्षी नेति-नेति असंगोऽहम् अहं ब्रह्मास्मि तत् त्वम् असि अयमात्मा ब्रह्म इनमें से यदि हम via-positiva का अर्थ लें—अर्थात् ऐसे शब्द जो सत्य के बारे में कोई सकारात्मक विशेषता, स्थिति या संकेत देते हैं—तो बड़ी संख्या इसी श्रेणी में दिखाई देती है। जैसे सत्, चित्, आनंद, पूर्ण, अनंत, नित्य, शुद्ध, चैतन्य, अमृत, शांति आदि। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण सावधानी है। इन शब्दों को पढ़कर ऐसा नहीं समझना चाहिए कि ब्रह्म या सत्य वास्तव में इन गुणों से बनी कोई वस्तु है। उदाहरण के लिए जब हम ‘अनंत’ कहते हैं, तो वह किसी वस्तु का आकार बताने जैसा नहीं है। जब ‘निर्गुण’ या ‘निराकार’ कहते हैं, तो भाषा स्वयं अपनी सीमा स्वीकार कर रही होती है। इसीलिए मेरी समझ में इन 50 शब्दों को केवल सकारात्मक और नकारात्मक दो डिब्बों में बाँटना थोड़ा अधूरा होगा। वेदांत की भाषा में सकारात्मक शब्द भी अंततः संकेत मात्र हैं, अंतिम परिभाषा नहीं। ‘नेति-नेति’ इस दृष्टि से विशेष है। यह सत्य को कोई नई पहचान देने के बजाय उन सभी पहचानों को हटाता है जिन्हें हम सत्य समझ बैठे हैं—‘यह नहीं, यह भी नहीं।’ इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि सकारात्मक शब्द कितने हैं, बल्कि यह भी है कि क्या मैं इन शब्दों को पकड़कर सत्य की जगह कोई मानसिक अवधारणा बना रहा हूँ? 2. सत्य या उच्चतम की बात करते समय मेरी भाषा नकारात्मक है या सकारात्मक? जब मैं अपने जीवन में सत्य या किसी ‘उच्चतम’ की बात करता हूँ, तो मेरी भाषा शुरुआत में अधिकतर सकारात्मक होती है। मैं सत्य को शांति, आनंद, स्वतंत्रता, पूर्णता, प्रेम, ज्ञान या मुक्ति जैसे शब्दों में सोचता हूँ। लेकिन थोड़ा गहराई से देखने पर लगता है कि इसमें एक खतरा भी है। मैं जिस चीज़ की तलाश कर रहा हूँ, उसकी एक तस्वीर मन में बना लेता हूँ—‘सत्य ऐसा होगा’, ‘ज्ञान मिलने पर ऐसा अनुभव होगा’, ‘मुझे हमेशा शांति मिलेगी।’ इस तरह सत्य भी मेरे लिए एक प्राप्त करने योग्य वस्तु या अवस्था बन जाता है। यहीं ‘नेति-नेति’ की आवश्यकता समझ में आती है। अगर मुझे यह साफ़ दिखाई देने लगे कि मेरे भीतर की बेचैनी किन चीज़ों से बनी है—अहंकार, अपेक्षा, पहचान, भय, आसक्ति, दूसरों से तुलना, उपलब्धि की भूख—तो सत्य को कोई नया रूप देने की आवश्यकता कम हो जाती है। पहले यह देखना आवश्यक हो जाता है कि मैं क्या-क्या पकड़े बैठा हूँ और उनमें से क्या वास्तव में मेरा है। इसलिए मेरे लिए सत्य की भाषा अंततः नकार की भाषा अधिक सार्थक लगती है। ‘मैं सत्य को पा लूँगा’ की जगह— यह मैं नहीं हूँ। यह भी मेरा अंतिम सत्य नहीं है। यह पहचान भी छोड़ी जा सकती है। यह इच्छा भी मुझे पूरा नहीं कर सकती। यह सहारा भी स्थायी नहीं है। यह नकार निराशावाद नहीं है। यह उन झूठे सहारों को हटाने की प्रक्रिया है जिन्हें मैं सत्य समझकर पकड़े बैठा हूँ। मुझे लगता है कि सकारात्मक भाषा मन को एक नई कल्पना दे सकती है, जबकि नकार मन की पुरानी कल्पनाओं को चुनौती देता है। और शायद यही कारण है कि वेदांत में ‘नेति-नेति’ केवल एक दार्शनिक वाक्य नहीं, बल्कि आत्म-परीक्षण की दिशा बन जाता है। अंततः सत्य को पाने से पहले शायद यह देखना अधिक जरूरी है कि मैं सत्य के रास्ते में क्या-क्या लेकर खड़ा हूँ। जब झूठे सहारे गिरते हैं, तब जो बचता है उसे किसी नए नाम, रूप या उपलब्धि की आवश्यकता नहीं रहती।



















