
1️⃣ जहाँ कई विकसित देशों में महिलाओं की खेल उपलब्धियाँ राष्ट्रीय सफलता का बड़ा आधार हैं, वहीं भारत में अक्सर लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित किया जाता है और उनके पहनावे या शरीर तक चर्चा सीमित रह जाती है। इसके पीछे कौन-सी गहरी मान्यताएँ काम करती हैं? हाल के समय से कुछ उदाहरण देकर बताइये कि कैसे लोकधर्म इसमें एक बड़ी भूमिका निभाता है। भारत में लड़कियों को खेल से दूर रखने के पीछे कोई एक कारण नहीं, बल्कि एक पूरा लोकधर्म काम करता है — वह सामूहिक, अलिखित नियमों की व्यवस्था, जो बताती है कि "अच्छी लड़की" कैसी दिखनी चाहिए। खेल में पसीना, चोट, शॉर्ट्स, प्रतिस्पर्धा — ये सब उस "शालीनता" की छवि से टकराते हैं, जो समाज ने स्त्री पर थोप रखी है। इसलिए बेटी को मैदान में उतरने से पहले ही रोक दिया जाता है, या रोका न भी जाए, तो उसकी काबिलियत की जगह उसका पहनावा चर्चा का विषय बन जाता है। हाल के उदाहरण इसे साफ़ दिखाते हैं — जब भी कोई भारतीय महिला एथलीट शॉर्ट्स या फिटेड स्पोर्ट्सवियर में मेडल जीतती है, सोशल मीडिया पर उसकी उपलब्धि से पहले उसके "पहनावे" पर टिप्पणियाँ आने लगती हैं। विनेश फोगाट और साक्षी मलिक जैसी पहलवानों का संघर्ष भी यही दिखाता है — उन्हें मैदान की चुनौतियों से ज़्यादा समाज की उस निगाह से लड़ना पड़ा, जो एक महिला पहलवान के शरीर को "अनुचित" मानती थी। यह लोकधर्म स्त्री को यह याद दिलाता रहता है कि उसका शरीर पहले "देखे जाने" की वस्तु है, "प्रदर्शन" का माध्यम बाद में। आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी क्यों कहते हैं? आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी इसलिए कहते हैं क्योंकि अहंकार का जन्म ही शरीर के साथ तादात्म्य (identification) से होता है। "मैं यह देह हूँ" — यही वह पहला झूठ है, जिस पर बाकी सारा अहंकार-भवन खड़ा होता है। जन्म लेते ही चेतना सबसे पहले शरीर को अपना घर, अपनी सीमा और अपनी पहचान मान लेती है। फिर उसी शरीर के आधार पर लिंग, जाति, रंग, सुंदरता, ताक़त — ये सारी कॉलोनियाँ एक के बाद एक बसती चली जाती हैं। इसीलिए स्त्री के शरीर पर समाज की जो पकड़ है — नाज़ुकता थोपना, शर्म सिखाना, "छुईमुई" बनाना — वह दरअसल अहंकार की उसी कॉलोनी को और मज़बूत करने का तरीका है। जब तक कोई देह से खुद को देह ही समझता रहेगा, वह उन नियमों से बंधा रहेगा, जो देह पर थोपे गए हैं। मुक्ति वहीं से शुरू होती है, जहाँ यह साफ़ हो जाए — मैं देह नहीं हूँ, देह मेरा माध्यम है, मेरी सीमा नहीं। योगा करते हुए मेरी फ़ोटो



















