
1️⃣ भारत में लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित करने के पीछे की मान्यताएँ 🔸समाज मानता है कि स्त्री का शरीर व्यक्तिगत नहीं, पारिवारिक और सामाजिक "इज़्ज़त" की संपत्ति है। इसलिए दौड़ना, कूदना, पसीना बहाना, टाइट कपड़े पहनना, यह सब "मर्यादा" के विरुद्ध माना जाता है। 🔸माँ-बाप को डर रहता है कि खेलने से रंग काला पड़ेगा, शरीर "मर्दाना" दिखेगा (कंधे चौड़े हो जाने का मुद्दा), चोट लगेगी, और यह सब शादी के बाज़ार में उसकी "क़ीमत" घटा देगा। 🔸यहाँ लोकधर्म का मतलब है वह अलिखित, रोज़मर्रा का सामाजिक नैतिकता-तंत्र जो शास्त्रों से नहीं, बल्कि गली-मोहल्ले की टिप्पणियों, सास-ननद की नज़रों, और "लोग क्या कहेंगे" से चलता है। हाल के उदाहरण: 🔸 जुलाई 2026 में एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप के दौरान भारतीय महिला धाविकाओं की जर्सी की लंबाई को लेकर सोशल मीडिया पर हुई बहस, प्रदर्शन से ज़्यादा पहनावे पर चर्चा। 🔸कुश्ती जैसे खेलों में महिला पहलवानों को अक्सर परिवार में यह सुनना पड़ता है कि "यह लड़कों का खेल है, तुम्हारी शादी में दिक़्क़त होगी।" यही वजह है कि विनेश फोगाट और साक्षी मलिक जैसी खिलाड़ियों का संघर्ष सिर्फ़ मैदान तक सीमित नहीं रहा, घर की सहमति जीतना भी एक लड़ाई थी। 🔸कबड्डी और फुटबॉल जैसे "स्पर्श-आधारित" खेलों में लड़कियों की भागीदारी पर अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि "यह खेल लड़कियों के लिए ठीक नहीं," जबकि लड़कों के लिए वही खेल शौर्य का प्रतीक है। अंततः मुद्दा सिर्फ एक ही है कि एक लड़की के शरीर को बचाकर रखो कि वह बच्चे जन्म देने तक सीमित थे बस और इस तरह उसके ऊर्जा पर एक अदृश्य नियंत्रण बनाए रखता है। कल की बात फिर एक बार घर में मुद्दा बन गया कहते हैं अगर शादी नहीं करोगी तो सृष्टि रुक जाएगी फिर कहते हैं अबकी बार खूब शादी हुई क्षेत्र में😂 , इसका मतलब ये हुआ कि अगर जिधर भीड़ जा रही है तो अंधी थोड़ी है। फिर कहते हैं समाज ही तो आईना है। यही है फिर जब आचार्य जी कहते हैं उम्र तो खेलने की भी निकली जा रही है तब अहंकार ऐसा चोटिल होता है कि फिर कुछ दिन के लिए मुँह पर ताला लग जाता है। 2️⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी क्यों कहते हैं? अहंकार के पास कोई विषय हो या न हो लेकिन शरीर तो जन्मजात मिला हुआ है तो उससे अलग तो छिन भर नहीं है इसीलिए तो पहली कॉलोनी है। अहंकार सबसे पहले शरीर पर ही अपनी पकड़ बनाता है। "यह शरीर मेरा है," "यह शरीर कैसा दिखे," "यह शरीर किसके नियंत्रण में रहे," और फिर यही दावा नियंत्रण समाज स्त्री के शरीर पर करता है क्योंकि इस पर नियंत्रण के बाद ही उसकी चेतना पर कब्ज़ा करता है। 3️⃣ खेलों को प्रोत्साहन नहीं, बिल्कुल नहीं पहले काम होना चाहिए खेल में क्या रखा है हमें इतना अच्छे से बचपन से ही दिमाग में घुसा जो दिया गया है "पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे होगे खराब।" ये इतना आसानी से कैसे निकले। लेकिन मैं फिर भी खेलती हूँ वैसे तो मैं हमेशा से लगभग फिजिकल वर्क करने की तरफ झुकाव रहा ही है कि कुछ शारीरिक श्रम तो चाहिए शरीर को नहीं तो थोड़ा अजीब लगने लगता है कि आज कुछ तो नहीं किया। रनिंग तो मैं हमेशा से करती थी लेकिन आचार्य जी से जुड़ने के बाद ही मैंने रनिंग में मेडल भी प्राप्त किए और अब बैडमिंटन भी खेलती हूँ और रनिंग तो मुझे अधिक प्रिय है क्योंकि मुझे इससे काफी बाहरी तौर पर ही नहीं आंतरिक तौर पर भी काफी मजबूत बनाता है। और साइकिलिंग भी करती हूँ।




















