
एक कमजोर मां से एक मजबूत मां बनने तक का सफर ✨️✨️✨️✨️✨️✨️✨️✨️✨️✨️✨️✨️✨️✨️✨️ मैं बहुत ही कमजोर थी, आंतरिक रूप से । छोटी-छोटी बातों पर रोना-धोना शुरू कर देती थी और उसका जिम्मेदार हमेशा दूसरे लोगों और परिस्थितियों को समझती थी। इस कारण बहुत जादा डरपोक भी होती जा रही थी। सही बात भी डर के मारे बोली नहीं जाती थी, एक आवाज नहीं निकलती थी,और इसी वजह से लोग मुझे दबाते जाते थे, मेरा शोषण करते रहते थे। ये काफ़ी सालों तक रहा और उसके परिणामस्वरूप मेरे भीतर बहुत ज़्यादा एंगर और एंजाइटी का रूप लेने लग गया था। जब मेरी शादी हुई और मेरी बेटी हुई, तो मैं अपनी बेटी को संभाल नहीं पा रही थी और मैं अकेले बहुत फ्रस्ट्रेट हो रही थी उसको पालने में। लोग इसको 'पोस्टपार्टम डिप्रेशन' कहते हैं लेकिन वो डिप्रेशन मेरा बचपन का था। और मैं छोटी सी बच्ची को अपने मारती थी, पीटती थी। मैं नहीं टैकल कर पा रही थी सब कुछ. फिर मेरी बेटी जब लगभग 3-4 साल की हुई तो मुझे आचार्य जी के यूट्यूब वीडियोज़ मिले। मैंने उनको सुनना शुरू कर दिया। ♥️यहाँ से ऐसे जीवन की शुरुआत होने लगी जिसकी मैंने कलपना भी नहीं की थी।♥️ 1-2 वीडियोज़ में तो मुझे अच्छा नहीं लगा था कि ये क्या बोल रहे हैं, हर एक चीज़ में विरोधाभास है। फिर धीरे-धीरे उनकी वीडियोज़ मैं सुनने लग गई और 2024, में मैं गीता सत्रों से जुड़ी और ये जुड़ना मेरे जीवन में बहुत बड़ा बदलाव था. 🌿 इसके बाद धीरे-धीरे आचार्य जी को सुनते-सुनते मेरे भीतर की जितनी ये परेशानियां थी, डर, गुस्सा, ये कम होने लग गयी धीरे-धीरे। गुस्सा बढ़ा पर गलत चीज़ों के पर। पहले ऐसे किसी भी चीज़ पे गुस्सा आ जाता था। किसी ने मुझे कुछ बोल दिया, या मेरी किसी चीज़ की बुराई कर दी और उन सब का गुस्सा मेरी फैमिली पर निकालता था और ये डर और ये गुस्सा इनहेरिट होने लग गया था, ऐसा लग रहा था मेरी बेटी पर. वो बहुत डरपोक होती जा रही थी। 4-5 की आयु में किसी इंसान को भी देख कर डर जाती थी।छोटी-छोटी चीज़ों से डर जाती थी।झूले नहीं झूलती थी। फिर आचार्य जी को सुनने के बाद मैं निडर होती चली गई। अपनी बातें खुलकर सबके सामने कहने लग गई। और जो चीज़ें मैं नहीं कर पाती थी वो सब करने लग गई। ड्राइविंग मेरे लिए ऐसा लगता था कितनी बड़ी चीज़ है, मुझसे नहीं होगी कभी। वो मैं करने लग गई। अकेले मैं किसी अनजान शहर में नहीं गई थी। आचार्य जी से मिलने के लिए, पहली बार लड़ -झगड़ कर मैं गई। मेट्रो में कैसे जाते हैं, कैसे सब कुछ करना होता है, मुझे कुछ भी नहीं पता था। मैंने सब अकेले किया और वो मेरी बेटी देख रही थी। जो बातें मैं करती थी आचार्य जी को सुनकर के, वो सब वो सुनती थी और बहुत समझदार होती जा रही है और उसके डर खत्म होते जा रहे हैं। अब वो बहुत Brave होती जा रही है। अपने स्कूल में भी हर एक कॉम्पिटिशन, हर एक चीज़ में बहुत अच्छा कर रही है। उसको मैंने ताइक्वांडो क्लासेज़ जॉइन करवाई हैं। कभी-कभी उसका मन करता है कि अब नहीं करूँगी पर आचार्य जी से जो शिक्षाएं मुझे मिली हैं, जो मैंने सीखा है, मैं उसको समझाती हूँ। फिर वो डटकर खड़ी हो जाती है और सीखती है।मैं भी इतना ज़्यादा थक जाती हूँ। मेरे दो बच्चे हैं लेकिन आचार्य जी की शिक्षाएं ही हैं जिसकी वजह से मैं थककर भी नहीं थकती । मैं अपनी बेटी को लेकर जाती हूँ ताइक्वांडो क्लास. कभी-कभी लगता है कि नहीं अब नहीं होगा, मैं नहीं ले जा पाऊँगी। म्यूजिक क्लास जाती है वो, ताइक्वांडो क्लास जाती है और उसके साथ भी यही होता है,कभी-कभी लगता है कि वो नहीं कर पाएगी, पर उसमें भी वो अब बहुत अच्छा कर रही है. सर बोलते हैं कि संस्कृति सबसे ज़्यादा अच्छा कर रही है ताइक्वांडो में और म्यूजिक में भी सर कहते हैं कि ये गॉड गिफ्टेड है। 😀😆 हम दोनों मेहनत करते हैं, और ये सब आचार्य जी की ही देन है, नहीं तो ये सब मैं कर नहीं पाती कभी भी। बहुत-बहुत आभार आचार्य जी. हमें इतना आंतरिक बल देने के लिए, और इतनी हिम्मत, इतनी स्पष्टता देने के लिए। आपकी ही वजह से आज मैं अपनी बेटी को इतनी अच्छी शिक्षा के साथ बड़ा कर पा रही हूँ,नहीं तो ये कभी भी संभव नहीं था। धन्यवाद 🙏🙏🙏











































