
Pooja
मैं व्यवस्था में भ्रष्टाचार देखकर परेशान हूँ, लेकिन क्या मैं अपने छोटे लाभ के लिए नियम तोड़ने को तैयार हूँ? मैं भेदभाव का विरोध करती हूँ, लेकिन क्या मैं स्वयं लोगों को उनकी स्थिति, योग्यता या पहचान के आधार पर कमतर समझती हूँ? मैं दिखावे की संस्कृति से परेशान हूँ, लेकिन क्या मुझे स्वयं दूसरों की प्रशंसा और मान्यता की आवश्यकता है? मैं सत्ता के दुरुपयोग का विरोध करता हूँ, लेकिन क्या अपने छोटे से अधिकार में मैं दूसरों पर नियंत्रण जमाना चाहती हूँ? इस प्रश्न का उद्देश्य खुद को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि यह देखना है कि व्यवस्था और व्यक्ति अलग-अलग चीजें नहीं हैं। समाज जिन प्रवृत्तियों से बनता है, वे व्यक्तियों के भीतर भी किसी न किसी रूप में उपस्थित हो सकती हैं।



















