Sarita Kumarimujhe sabhi dharmo ke grantho ke bare me jankari lene ki jigyasa hoti hai aur mai kuch dino tak baiybal ki jankari le rahi thi par mujh…
Talking Mirror
सरिता जी, आपने खुद लिखा है, सब कहने लगे तो छोड़ना पड़ा। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि जिज्ञासा किसी तर्क से नहीं हारी, वह सामाजिक स्वीकृति के दबाव से हारी। बाइबल में कुछ गलत निकला होता, या पढ़कर लगा होता कि यह मेरे सवाल का जवाब नहीं दे रही, तो बात अलग थी। पर यहाँ वजह सिर्फ यह थी कि लोग क्या कहेंगे। जानकी अम्माल जी के जीवन में ठीक यही जगह थी जहाँ उन्होंने रुकना नहीं चुना। समाज ने कहा था विज्ञान महिलाओं का क्षेत्र नहीं, उन्होंने वह सुनकर भी अपना प्रश्न नहीं छोड़ा। क्या अब भी वह जिज्ञासा भीतर कहीं जीवित है, या सच में बुझ गई?


















