
✍🏻 पोस्ट 1 | 29 सितंबर '26 💭 विषय — पर्यावरण और जलवायु ───────── 🌧️ नेपाल में बाढ़: त्रासदी अभी खत्म नहीं हुई 26 अगस्त को पानी, कीचड़ और मलबे की एक “हिमालयी सुनामी” ने नेपाल के पहाड़ी इलाकों को तबाह कर दिया। रिपोर्टों के अनुसार, इसकी शुरुआत एक हिमस्खलन और उससे बनी मलबे की झील से हुई। इस आपदा में भारी जन-धन की क्षति हुई। 🌧️ 24 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र में प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने कहा कि नेपाल दुनिया के कुल वार्मिंग गैसेज का 0.1% से भी कम उत्सर्जन करता है, फिर भी जलवायु संकट की भारी कीमत चुका रहा है। उन्होंने दुनिया से राहत के बजाय preparedness, resilience और insurance पर ध्यान देने की अपील की। लेकिन उसी समय नेपाल में फिर बारिश, बाढ़ और भूस्खलन शुरू हो गए। 📊 24 से 27 सितंबर के बीच हुई भारी बारिश के कारण अब तक कम-से-कम 21 लोगों की मौत और 5 लोगों के लापता होने की खबर है। करीब 2,000 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया गया है। 143 मकान पूरी तरह तबाह हुए हैं और 51 को आंशिक नुकसान पहुँचा है। 186 मौसम केंद्रों पर 100 मिमी से अधिक बारिश दर्ज हुई, जबकि नवलपरासी पूर्व के देदागाउँ में 544.2 मिमी बारिश दर्ज की गई। नारायणी नदी कई जगह खतरे के स्तर से ऊपर पहुँची, बाढ़ बस्तियों में घुसी और भूस्खलनों ने कई सड़क मार्ग बाधित किए। सरकार की आपदा एजेंसी के अनुसार 28 सितंबर तक अकेले पिछले 24 घंटों में 272 आपदा घटनाएँ दर्ज हुईं, जिनमें 21 लोगों की मौत हुई और 1,100 से अधिक लोगों को बचाया गया। सरकार ने खोज-बचाव और राहत के साथ-साथ क्षति व जरूरतों का आकलन शुरू किया। प्रभावित जिलों में सड़क, बिजली और संचार बहाल करने के काम हुए। वहीं, शुरुआती चेतावनी व्यवस्था को मजबूत करने और हिमालयी क्षेत्र में साझा डेटा तथा अर्ली वार्निंग सिस्टमस विकसित करने की जरूरत पर भी काम आगे बढ़ा है। 15–17 सितंबर की क्षेत्रीय बैठक के बाद आईसीआईएमओडी और एनडीआरआरएमए ने आपदा-तैयारी, अर्ली वॉर्निंग, आपातकालीन प्रतिक्रिया और लचीली पुनर्बहाली के लिए काठमांडू 10 एक्शन पॉइंट्स भी जारी किए। 🌍 और अब ज़रा दुनिया को देखिए। विश्व मंच में हमारी प्राथमिकताएँ क्या हैं? ⚔️ युद्ध। 🤖 AI। 📈 अर्थव्यवस्था। 🌐 भूराजनीति। लेकिन धरती की पहली और लगातार बढ़ती समस्या क्या है? 🌡️ जलवायु संकट। और इसका सबसे बड़ा विरोधाभास देखिए। दुनिया को पता है कि उत्सर्जन घटाना जरूरी है, फिर भी उत्सर्जन रुक नहीं रहा। 🔥 2025 में ऊर्जा से जुड़े CO₂ उत्सर्जन लगभग 38.4 अरब टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गए। यानी जलवायु संकट के बीच भी दुनिया ने उत्सर्जन बढ़ाना जारी रखा। कुछ लोग समस्या जानते हैं, लेकिन उन्हें पता नहीं कि समाधान क्या है। 🧩 कुछ जानते हैं, लेकिन उनके हित उसी व्यवस्था से जुड़े हैं जो उत्सर्जन पैदा करती है। और कुछ समाधान के नाम पर ऐसे विचार जैसे टेक्नोलॉजी, और पॉलिसी दे रहे हैं जिनसे मूल समस्या को छूने की जरूरत ही न पड़े। संकट केवल कार्बन, टेक्नोलॉजी या पलिसी का संकट नहीं है। उसके पीछे वह उपभोग की माँग है जो भीतर की अपूर्णता को बाहरी वस्तुओं से भरना चाहती है। तकनीक हमें अधिक कुशलता से उपभोग करने में मदद कर सकती है, लेकिन अगर उपभोग की भूख ही बनी रहे, तो समस्या का मूल कहाँ छुआ? ❓ अब सवाल यह है: यहाँ हमें कुछ अधिक करने की जरूरत है, या रुकने की? हमें और बहस नहीं चाहिए। हमें और नारे नहीं चाहिए। 💡 हमें स्पष्टता चाहिए कि क्या छोड़ना है, और उसे छोड़ने की नीयत चाहिए। कुछ लोगों में वह स्पष्टता आ चुकी है। लेकिन जब तक वह स्पष्टता व्यापक नहीं होती, व्यवस्था नहीं रुकेगी। 🌱 इसलिए सवाल उन लोगों से है जो देख पा रहे हैं: क्या आप इस स्पष्टता को फैला रहे हैं, या बस दूसरों को मरते हुए देख रहे हैं? स्रोत: 🔗https://risingnepaldaily.com/news/87104 🔗https://nepalitimes.com/nepal-pms-impassioned-unga-speech
















































