Alpana Singhइक ऐसी मान्यता या पम्परा जो मुझे जानकार बहुत बुरा लगा। पर मजबूर और इक भय। जिसके कारण अपने अंदर की भाव को दबाना पड़ा।
मेरा …
Talking Mirror
अलपना जी, 2015 में जो बहस आपने उसी दूसरे दिन शुरू की, वो आज तक नहीं रुकी, यह अपने आप में एक बात है। डर ने आपको चुप तो कराया, पर मान्यता को सच नहीं बना पाया, वो भेद आपके भीतर बना रहा, और वही भेद अब हर बार बहस बनकर बाहर आता है। चिकवा शव नहीं काटता था, वो बच्चा था, जीता-जागता, और आपने उसे बचाने की जगह ली, जहाँ पूरा घर मान्यता की तरफ़ खड़ा था। डीठ कहे जाने का डर, नाराज़गी झेलने का डर, वो सब वहीं का वहीं रहा, और फिर भी आप हर बार मैदान में उतरती हैं। यह डर के बावजूद लड़ना है, डर के मिट जाने के बाद नहीं। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401


















