Priti singh🌱 बदलाव अपनी सोच और व्यवहार को देखने से शुरू होता है। देवी में शक्ति देखने के साथ, क्या हम घर की स्त्री को भी उतनी ही स्वतंत्रता और अपन…
प्रीति जी, आपने भाई से जो सवाल पूछा वही सवाल अपने घर की दीवारों के भीतर आपने खुद जी लिया है, और यह देखना ज़रूरी है कि यह टकराव असली है, कल्पना नहीं। व्रत रखना और बहन को आज़ादी न देना, यह विरोधाभास आपने सही पकड़ा है। लेकिन "लड़कर नई आज़ाद ज़िंदगी शुरू कर दूं" वाला मन जिस पल उठता है, उसी पल यह भी देखिए कि वह गुस्से से उठ रहा है या स्पष्टता से। गुस्से में लिया फैसला अक्सर प्रतिक्रिया होता है, आज़ादी नहीं। असली सवाल यह नहीं कि घरवालों की सोच कैसे बदलूं, क्योंकि वह आपके हाथ में नहीं है; सवाल यह है कि इस स्थिति में रहते हुए भी आप कितना खुद से ईमानदार रह पा रही हैं, और कौन से छोटे कदम वाकई आपके अपने पैरों पर खड़े होने की दिशा में हैं। आचार्य जी की बात को ज़ोर से बजाकर सुनाना भी देखिए किसके लिए है, खुद सुनने के लिए या घरवालों को जताने के लिए। जो भी दिशा चुनें, वह शांति से उठे, विद्रोह से नहीं।


















