
✍🏻 पोस्ट 25 | 14 अक्टूबर '26 💭 विषय — पर्यावरण और जलवायु ────────────── 🌍 जलवायु संकट के बीच रिपोर्ट टालने की ज़रूरत क्यों? 🌍 IPCC की अगली व्यापक जलवायु आकलन रिपोर्ट (AR7) को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद बढ़ रहा है। 🌐 सऊदी अरब और रूस के साथ भारत और चीन भी इसकी रिपोर्ट जारी करने की तारीख 2028 से बढ़ाकर 2029 करने की मांग कर रहे हैं। 🗣️ उनका तर्क है कि विकासशील देशों को जलवायु विज्ञान में अपनी राय और विशेषज्ञता शामिल करने के लिए अधिक अवसर मिलने चाहिए। 🌱 वहीं, जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित देशों, यूरोपीय संघ और अन्य महत्वाकांक्षी जलवायु कार्रवाई का समर्थन करने वाले देशों की मांग है कि रिपोर्ट समय से पहले जारी की जाए। ❓ यह मुद्दा इतना महत्वपूर्ण क्यों है? 📊 AR7 रिपोर्ट से 2028 के अंत में होने वाले COP33 से पहले वैश्विक जलवायु स्टॉकटेक को दिशा मिलने की उम्मीद है। 🌍 यह एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से आकलन किया जाता है कि दुनिया जलवायु परिवर्तन से निपटने के अपने लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में कितनी आगे बढ़ी है। 🎯 इसके साथ ही यह भी निर्धारित किया जाता है कि देशों को अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं को और मजबूत करने की आवश्यकता है या नहीं। 🌡️ जब वैश्विक तापमान पहले ही 1.5°C की सीमा को पार कर चुका है, तब जलवायु कार्रवाई की तात्कालिकता और बढ़ जाती है। 📈 देशों के मौजूदा राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्य भी 1.8°C से अधिक तापमान वृद्धि की ओर संकेत कर रहे हैं। ⚠️ ऐसे में वैज्ञानिक रिपोर्ट जारी करने में देरी का अर्थ जलवायु कार्रवाई को तेज करने के दबाव में देरी होना भी हो सकता है। ⚖️ हालांकि, जलवायु न्याय और समान प्रतिनिधित्व के तर्क को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 🌏 लंबे समय से जलवायु अनुसंधान में ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों के दृष्टिकोण, अनुभवों और विशेषज्ञता को पर्याप्त स्थान न मिलने की आलोचना होती रही है। 🤔 इसलिए असली सवाल यह है कि क्या रिपोर्ट को एक साल टालने से वास्तव में इन असमानताओं को दूर करने और विकासशील देशों की भागीदारी बढ़ाने में मदद मिलेगी। ❓ या फिर इससे वैश्विक स्तर पर जलवायु जवाबदेही और मजबूत कार्रवाई की तात्कालिकता कमजोर पड़ जाएगी? 🌍 इशारा कुछ ऐसा मिल रहा है कि शायद रिपोर्ट को टालना चाह रहे हैं। लेकिन यह कोई ऑफिस असेसमेंट तो है नहीं, जिसे कल कर लूँगा कहकर टाल दिया जाए। हर दिन, हर क्षण उलटी गिनती चालू है। कहीं बाढ़ आ रही है, कहीं गर्मी सहन नहीं हो रही। ग्लेशियर लगातार घट रहे हैं। ⚠️ हम रिपोर्ट टाल सकते हैं, महाविनाश नहीं। हम उधर देखना नहीं चाह रहे, जिधर देखने में हमारे स्वार्थों पर चोट पड़ेगी। लेकिन अगर रिपोर्ट नहीं भी टली, तो कुछ नीतियों में बदलाव आएँगे। जलवायु परिवर्तन रुकने वाला नहीं है, क्योंकि उसका रिश्ता उस जगह से है ही नहीं, जहाँ हम उँगली दिखा रहे हैं। 🧠 जलवायु परिवर्तन बस एक लक्षण है। समस्या भीतरी है। ❓ आपके अनुसार IPCC की रिपोर्ट क्यों टाली जा रही है? A. रिपोर्ट समस्या तो दिखाती है, समाधान नहीं दे पाती, और शायद सबको पता है कि इससे कुछ होने वाला नहीं है। B. रिपोर्ट में देरी करके जलवायु कार्रवाई की जवाबदेही से बचना। C. विकसित और विकासशील देशों के बीच वैज्ञानिक प्रतिनिधित्व और प्रभाव को लेकर खींचतान। D. आर्थिक हितों को जलवायु विज्ञान से ऊपर रखना। E. कठोर वैज्ञानिक निष्कर्षों के आधार पर नीतिगत बदलाव करने का दबाव टालना। स्रोत: https://www.theguardian.com/environment/2026/oct/13/ipcc-pressure-delay-publication-climate-report-ar7-cop33















































