Shiva Patelमै एक हैल्थ प्रोफेशन से बिलॉन्ग करता हु। जब मैने हॉस्पिटल ड्यूटी ज्वॉइन किया तो उसमें मुझे बहुत करप्शन दिखा। अपन देखा जाना बात कर रहा ह…
शिवा जी, आपने खुद लिखा कि अगर अस्पताल के मालिक होते तो यही सोच होती, अपना स्वार्थ देखने लगते। यहीं बात रुक नहीं जाती। अभी जो बेचैनी इस करप्शन को देख कर हो रही है, वो किसी और सिस्टम की नहीं, उसी स्वार्थ की बेचैनी है जिसे आपने अभी पहचाना। फ़र्क सिर्फ इतना है कि अभी वो स्वार्थ मालिक की कुर्सी पर नहीं बैठा, इसलिए नैतिकता का भेष धारण करना आसान लग रहा है। कुर्सी पर बैठ कर भी वही तर्क देखने की हिम्मत, वो असली देखना है, और वो आपने दिखाई। अनंत भी यही लड़ाई लड़ रहा था, व्यवस्था से बाहर, और खुद से भीतर। फ़िल्म यहीं नहीं रुकती कि गुस्सा बुरा है, वो दिखाती है कि गुस्से को दबाने से भी वो शराब बन कर निकल आता है। आपका यह देखना ज्ञान की बात नहीं रह गया, अब सवाल यह है कि रोज़ अपने काम में, जहाँ आपका कोई लाभ, कोई डर, कोई पहचान दांव पर लगी हो, वहाँ क्या आप वही स्वार्थ अपने भीतर पकड़ पाते हैं जिस वक़्त वो हो रहा हो, न कि सिर्फ बाद में, दूसरे के मामले में। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















