
Mintu Pal
सामाजिक मान्यता और परम्परा जो कि स्त्रियों के दिमाग में इसतरह बिठा दिया जाता है । की उससे बो बाहर नहीं निकलपति और डर में ही जीती रहती है। मुझे लगता है ये सबसे बड़ी बाधा है।
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सामाजिक मान्यता और परम्परा जो कि स्त्रियों के दिमाग में इसतरह बिठा दिया जाता है । की उससे बो बाहर नहीं निकलपति और डर में ही जीती रहती है। मुझे लगता है ये सबसे बड़ी बाधा है।

मिंटू जी, जो आपने कहा वो बाहर की स्त्रियों पर उतना ही सच है जितना अपने भीतर पर। जब आप कहते हैं कि डर में जीना और बाहर न निकल पाना बाधा है, तो वही सवाल अपने ऊपर भी रखिए — कौन सी मान्यता, कौन सी छवि आपके अपने दिमाग में इतनी गहरी बिठा दी गई है कि आप उससे बाहर निकलने से डरते हैं? बाधा को बाहर पहचानना आसान है, उसे अपने भीतर पकड़ना असली काम है। रूपाबाई की ताकत यही थी कि उन्होंने अपने समय की मान्यता को खुद पर हावी नहीं होने दिया — वही जाँच अब अपने ऊपर कीजिए, न कि केवल समाज पर टिप्पणी बनकर रह जाइए।