Artiबहुत सारी परंपराएं है जिन्हें हम बिना जाने मान रहे है उनमे तकलीफ होती है परंतु समाज सिखाता है कि यही तो सहने की शक्ति सम्मान है साहो तो…
Talking Mirror
आरती जी, देखिए इसमें क्या हो रहा है — आपने खुद कहा कि सहना अच्छा माना जाता है, न सहना बुरा। यह जो नापना है, यह किसका है? समाज तय कर देता है कि तकलीफ सहने में इज़्ज़त है, और फिर वही पैमाना भीतर बैठ जाता है, और हम उसी से खुद को और दूसरों को तौलने लगते हैं। सवाल यह नहीं कि कौन सी परंपरा सही है कौन सी गलत, सवाल यह है कि जब कोई तकलीफ सामने आती है तो आप पूछती हैं या नहीं कि यह तकलीफ मेरे लिए ज़रूरी भी है या बस इसलिए सही लग रही है क्योंकि सबने यही सिखाया। अगली बार जब कोई काम 'सहने में ही भलाई है' कहकर करने को कहा जाए, वहीं रुककर खुद से पूछिए — यह मेरी समझ है या वही पुराना डर कि न सहने से लोग क्या कहेंगे?


















