Sarvesh Chaturvedi*🪔 मेरा मंदिर है यह बोध हॉल, ये बोध सत्र! *
* दर्शन के लिए मै,पत्नी, बच्चे, भाई मित्र सब एक साथ*
मेरे बच्चों के लिए इस मंदिर के अलावा …
सर्वेश जी, आपने जो बात सबसे गहरी कही है वह यह कि बोध हॉल पूजा-स्थल नहीं, जीवन समझने का स्थान है। यही फ़र्क़ असली है। मंदिर अक्सर सिर झुकाने की जगह बन जाता है, नमस्कार करके मन को शांत कर लेने की जगह; पर जो यहाँ हो रहा है वह उससे कठिन है—पत्नी के साथ, भाई के साथ, मित्रों के साथ अपने व्यवहार को बार-बार आईने में देखना, यह पूछना कि मैं उस रिश्ते में वास्तव में क्या माँग रहा हूँ। परिवार को इस धारा से जोड़े रखने की जो चाह आपमें है, वह इसलिए सार्थक है क्योंकि घर में भी वही सवाल जीना है जो हॉल में पूछा जाता है—सुख-सुविधा अलग चीज़ है, और सही ढंग से जीना अलग; आपका अपना घर इस समझ की पहली परीक्षा-भूमि बनेगा। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















