
1) आचार्य जी से जुड़ने से पहले मुझे पता ही नहीं था कि जीवन मुक्ति जैसा कुछ सामान्य व्यक्ति के लिए कुछ होता है | मुझे लगता था कि मुक्ति केवल जो साधु ,संत या मुनियों के लिए ही होती है | ओर जीवन मुक्ति चाहिए ही क्यों? क्या जरूरत है ? सब तो मर ही जाते है चाहे वो कोई भी हो | अब थोड़ा समझ आने लगा है कि मुक्त होने वाला ओर मुक्ति का चुनाव करने वाला दोनों एक ही है | ओर शरीर मुक्तिबके लिए एक साधन है | 2)आज कल जंगल के कौन जाता है ?केवल जंगल में जाने से मुक्ति मिलती है इस मान्यता ने आम व्यक्ति के भीतर एक धारणा बना दी ,की यह काम बहुत कठिन है ओर बहुत खास लोगो को ही मुक्ति मिल सकती है इसलिए मुक्ति के नाम पर कई पाखंड किए जाते है 3)जीवन मुक्ति का अर्थ है इसी शरीर के साथ स्वयं के अंदर बैठे झूठ को पहचानकर उसको नकारना | ये नकारना चलता रहता है ओर झूठ को हर दिन देखना होता है | अहंकार हर दिन एक जैसा नहीं होता कभी बहुत बैचेनी उठती है ,ओर उसके कुछ पल बाद ही ये सोचती हु कि " मैं क्यों इतना सोच रही हु"? मुझे क्या करना है ? ये प्रश्न उस बैचेनी को कटने के लिए है कि किसी तरह ये बैचेनी दब जाए या मिट जाए



















