
“मैंने पहली बार कोई देखा है जो अपनी जॉब से खुश है!” कल तबियत थोड़ी ठीक नहीं थी और मैं लेट भी हो गई थी स्केटिंग क्लास के लिए तो बैठकर सोचने लगी जाऊँ या न जाऊँ। Calculations करने लगी। फिर पिछला श्रीमद्भगवद्गीता का सत्र याद आ गया, बैग उठाया और निकल गई। जाते ही कोच ने कहा कि मैंने आपके स्टेटस पर देखा, वो कौनसी खिलाड़ी (सुचिका तरियाल जी) आई थीं आपके सत्रों में? उसके बाद पूछने लगे सत्रों के बारे में, कैसे जॉइन करते हैं, मैं क्या करती हूँ संस्था में। पहले दिन भी पूछा था। आज थोड़ा ज़्यादा उत्साहित थे। बोले कि हमारे खिलाड़ियों को भी मोटिवेशन 😢 चाहिए तो क्या process होती है कि उनको कभी-कभार ले जाया जाए। मैंने उनको बताया कि क्या प्रक्रिया होती है। विस्तार में नहीं बता पाई क्योंकि वो जल्दी में थे। फिर उन्होंने कहा कि मैंने पहली बार कोई इंसान देखा है जो अपनी जॉब से इतना खुश है। ज़्यादातर तो बस झेलते हैं। मन ही मन सोचने लगी कि इन्हें कैसे बताऊँ, ये काम ही ऐसा है कि अगर ईमानदारी से किया जाए, तो ख़ुशी भले न दे, आनंद ज़रूर देता है। इसे सिर्फ़ एक जॉब की तरह देखा ही नहीं जा सकता, और शायद यही इसकी ख़ासियत भी है। यहाँ काम सिर्फ़ एक ज़िम्मेदारी निभाने या कुछ टारगेट पूरे करने तक सीमित नहीं है। हर दिन ख़ुद को देखने का, अपनी कमियों को पहचानने का और उन पर काम करने का अवसर मिलता है। यहाँ गीता पढ़ी नहीं, जी जाती है। यह जीना ही धीरे-धीरे ज़िंदगी बदलने लगता है। और यहाँ काम करते हुए आप सिर्फ़ अपना जीवन नहीं बदल रहे होते, बल्कि इस संभावना के लिए भी काम कर रहे होते हैं कि किसी और की ज़िंदगी में भी कुछ बदल सके।
















































