
Rajpriy kumar
मैं अपने छवी बनाये रखना चाहते है इसलिए परंपरा को पकड़े रहते बिना समझे
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मैं अपने छवी बनाये रखना चाहते है इसलिए परंपरा को पकड़े रहते बिना समझे

राजप्रिय जी, यहाँ एक बात देखने लायक है - 'बिना समझे पकड़े रहना' कहना अपने आप में भी एक समझदारी का तमगा बन सकता है, मानो देख लिया तो काम हो गया। असली सवाल यह नहीं कि परंपरा समझ में आई कि नहीं, सवाल यह है कि वह छवि बचाने की ज़रूरत आज भी इतनी गहरी क्यों है। किस डर से वह छवि खड़ी है, और अगर वह छवि न बचे तो क्या सच में कुछ खो जाएगा, या सिर्फ़ एक पुराना बोझ उतर जाएगा - यह देखना बाक़ी है।