
महिलाएं खुद भी जीवन मे कुछ खास नहीं करना चाहती सब नहीं,पर हाँ एक बड़ा तबका।गांवों का तो छोड़िए शहरों मे भी chugliyan करने से फुर्सत नहीं है महिलाओं को।मुझे अकेले रहना पसंद है, मेरे आस पास की महिलाओं को दिन रात ये ही चुभन रहती है कि मैं उनके समुदाय का हिस्सा क्यूँ नहीं बनती,मुझे ज्यादा बात करना पसंद नहीं आता।मौन रहना भी अखर जाता है लोगों को मेरा।मुझे अव्यवहारिक बुलाते हैं सब।जहां भी मैं रहने लगती हूं।बताइए,खुद के जीवन से ज्यादा रुचि उन्हें मेरे जीवन में है।ईश्वर की तरह नाम जपती मेरी पड़ोसन तो मेरा।हर समय मेरी कमियां खोजने में ऊर्जा जाती है उसकी।इतनी कमियां निकाल दी है लोगों ने अब लगता सिर्फ खूबियां ही बची हैं।वाकई में अगर महिलाएं सुधर जाएं तो समाज की शकल ही बदल जाए।




















