
अपने दम पर कमाए गए बीस हज़ार रुपये भी दूसरे द्वारा मुफ्त में दिए गए एक लाख बीस हज़ार रुपये से ज्यादा दम और गरिमा रखते हैं। आचार्य जी मैंने कभी कल्पना में भी नहीं सोचा था कि अपनी पढ़ाई के साथ-साथ मैं पैसे भी कमा रही होऊंगी, पर आज मैं यह कर रही हूँ। मुझे कभी यह ज़रूरत महसूस नहीं हुई कि मुझे अभी से पैसे कमाने हैं, कम से कम इतने कि खुद का खर्चा निकल जाए। मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा था क्योंकि मैं ज़्यादा अरमान नहीं रखती और मेरे कुछ ख़ास शौक़ भी नहीं थे—और न ही अभी हैं। जो भी खर्च होता था, वह सिर्फ़ मेरी पढ़ाई को लेकर होता था, जिसे पापा पूरा कर ही देते थे; इसलिए कभी ख्याल ही नहीं आया कि मैं पैसे कमाऊँ। पर जब मैंने पहली बार आचार्य जी को सुना और उन्होंने यह बात कही कि "कम से कम इतना तो कमाओ कि खुद की रोटी खुद खा सको", तो यह बात मुझे बहुत ज़ोरों से खटकी। तब मैं देख पा रही थी कि मैं दूसरों पर कितनी निर्भर हूँ। फिर जब मैं गीता समागम से जुड़ी, तो एनरोलमेंट करने की बारी आई। मैंने कुछ पैसे बचत (saving) करके रखे थे, उसी से मैंने पहली बार अपना एनरोलमेंट किया। जब तक मेरी बचत के पैसे रहे, मैं एनरोलमेंट करती गई। पर बचत के पैसे तो एक समय के बाद खत्म होने ही थे। फिर मैं सोचने लगी कि क्या करूँ? पैसे कहाँ से लाऊँ? पर एक बात तय थी कि मुझे घर से पैसे नहीं लेने थे, क्योंकि गीता समागम से जुड़ना मेरा अपना चुनाव था। यह मेरा पहला सही चुनाव था जो मैंने खुद से किया था, किसी की सलाह से नहीं। इसलिए मैं चाहती थी कि जिस सही निर्णय को मैंने खुद चुना है, कम से कम उसके लिए तो मैं किसी और से पैसे न लूँ। यह भी मैंने आचार्य जी से ही सीखी है। मुझे लगा कि अगर मैं कोई सही काम खुद से कर रही हूँ, तो उसके लिए किसी और से पैसे क्यों लूँ? बस, फिर यहीं से मेरी यह यात्रा शुरू हुई। मैंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। शुरुआत में सिर्फ़ दो बच्चे ही पढ़ने के लिए तैयार हुए, क्योंकि गाँव में लड़कियों को पढ़ाने दिया जाना ही एक बड़ा सवाल होता है, पहला कि "तुम्हें पढ़ाना आता भी है या नहीं?" और दूसरी बात, यदि आप पढ़ा भी रहे हैं, तो उतने पैसे नहीं मिलते; ख़ासकर लड़कियों को तो बहुत कम मिलते हैं। मैंने कहा, "आप जो देंगे, मुझे कोई आपत्ति नहीं है, आप बस बच्चों को भेजिए, मैं पढ़ाऊँगी।" मैंने पढ़ाना शुरू किया, पैसे कम आ रहे थे, फिर भी मैंने जारी रखा। धीरे-धीरे मैं पढ़ाती गई और बच्चे आते गए। आज मेरे पास 9 बच्चे हैं जिन्हें मैं पढ़ाती हूँ। उनके द्वारा दिए गए पैसे से ही मैं अपना एनरोलमेंट करती हूँ और योगदान (donation) भी देती हूँ। जब पहली बार मेरे हाथ में मेरी खुद की कमाई आई थी, मैं बता नहीं सकती कि मैं कितनी खुश थी! इसका पूरा का पूरा श्रेय मैं आचार्य जी को देना चाहती हूँ। आचार्य जी का मार्गदर्शन न होता, तो शायद आज जो मैं ₹1500 कमा पा रही हूँ, वह भी कभी न कमा पाती। जब पहली बार मेरे हाथ में अपने पैसे आए, तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था, क्योंकि वो मेरी अपनी कमाई थी। जो मैंने अपनी मेहनत से कमाई थी। आज मुझे सच में समझ आ रहा है कि जब आचार्य जी कहते हैं: "अपने द्वारा कमाए गए ₹2,000 भी मुफ्त में मिले ₹2,00,000 से कहीं अधिक गरिमापूर्ण जीवन देते हैं।" अब यही कोशिश है कि अपनी आगे पढ़ाई की जारी रखूं और अच्छे से करूँ। दुनिया को और खुद को समझूँ और जानूँ।
















































