
जब हम खुद को नहीं देखते कि हम कौन सी गलतियां कर रहे हैं तो हमारे लिए सब कुछ साधारण लगता है जो अपने माहौल में लंबे समय तक रहता है उसे अपने माहौल की हर परिस्थिति साधारण लगने लगती है चाहे वह दूसरे आदमी के लिए भयानक कठोर सजा लगे, सोच रहा हूं वह कैसी दुनिया होती यदि मैं जिस माहौल में रह रहा हूं यदि यहां के माहौल के अनुसार यहां की कंडीशनिंग ना होती आज जो भी प्रथा समाज में मेरी यहां की प्रचलित है वह ना होती तो मैं किस तरह का बर्ताव करता मेरे यहां के लोग किस तरह बातें करते उन बातों में कौन सी मूल बात छिपी होती जानवरों के साथ कैसा व्यवहार करते सब लोग आपस में कैसे रहते क्या करते सब कुछ एक पलट सा जाता यदि जो कुछ अब हो रहा है वह रुक जाए या है जाए तो एक अलग ही दुनिया हमारी हो सकती है जो की एक कल्पना ही है लेकिन सोचिए हम जिस भगवान की पूजा कर रहे हैं रहना होता हम जिस हिसाब से खाना खाते हैं उसके अनुसार तो नहीं होते ।



















