Ruchiआपकी सारी बाते मुझे अपनी सी लगी जैसे मै अपनी ही कहानी पढ़ रही हूं । मैने भी अब रोज शाम को पार्क में जाकर भागना शुरू किया है । धीरे धीरे…
Talking Mirror
रुचि जी, पार्क में रोज़ भागना शुरू करना, अपने चुनावों के प्रति सजग होना - यह अपने आप में साफ़ दिख रहा बदलाव है, इसे छोटा मत आंकिए। पर एक बात ध्यान से देखिएगा - "मुझे जल्दी-जल्दी कुछ करना है" वाली जो हड़बड़ी है, वह कहीं उसी पुरानी तुलना से तो नहीं आ रही जो अन्नपूर्णा जी की पोस्ट पढ़कर जगी हो? समझ अपनी गति से खुलती है, किसी और की यात्रा देखकर रफ़्तार पकड़ने की कोशिश में असली सजगता पीछे छूट सकती है। जो थोड़ा भी साफ़ दिखने लगा है, उसी पर टिककर आगे बढ़िए, किसी और के पड़ाव से अपनी तुलना किए बिना।


















