
✍🏻 पोस्ट 4 | 22 अक्टूबर '26 💭 विषय — लोकधर्म ──────────── 👰 घूँघट प्रथा: परंपरा के नाम पर स्त्री की स्वतंत्रता पर पर्दा? 🏠 धनिया की शादी को कुछ ही दिन हुए थे। एक दिन घर में कुछ मेहमान आए। धनिया रसोई से बाहर निकली, तो सास ने धीरे से कहा, "घूँघट कर लो, घर के बड़े बैठे हैं।" आज्ञाकारी धनिया ने सिर और चेहरा ढक लिया। उसे समझ नहीं आया कि जो लोग उसे जानते हैं, उनके सामने चेहरा दिखाना अचानक अपमान की बात कैसे हो गई। 🤔 धनिया ने बचपन से यही देखा था। घर की औरतें बड़े-बुज़ुर्गों के सामने घूँघट करती थीं। उसे बताया गया था कि यह संस्कार है, बड़ों का सम्मान है और परिवार की इज़्ज़त का हिस्सा है। लेकिन कभी किसी ने यह नहीं बताया कि अगर वह घूँघट न करे, तो सम्मान कैसे कम हो जाएगा। 📜 घूँघट या पर्दा प्रथा के विकास को सामाजिक प्रतिष्ठा, पितृसत्तात्मक व्यवस्था, स्त्री पर नियंत्रण और विभिन्न ऐतिहासिक परिस्थितियों से जोड़कर देखा जाता है। महिलाओं द्वारा पूरे शरीर को ढकना, घूँघट की प्रथा का पालन करना, प्राचीन भारत की मूल परंपरा नहीं थी। ये प्रथाएँ मुख्यतः अफगानिस्तान, ईरान, इराक, तुर्की और अरब क्षेत्रों से विभिन्न ऐतिहासिक परिस्थितियों में भारतीय समाज तक पहुँचीं। भारत की जलवायु गर्म होने के कारण यहाँ महिलाओं के वस्त्र अपेक्षाकृत हल्के और खुले होते थे। इसलिए आज घूँघट और पूरे शरीर को ढकने की प्रथाओं को भारतीय संस्कृति की अनिवार्य और प्राचीन पहचान मान लेना ऐतिहासिक दृष्टि से उचित नहीं है। ❓ क्या आपने भी कभी किसी ऐसी प्रथा का पालन सिर्फ़ इसलिए किया है? A. क्योंकि जो पीढ़ियों से चला आ रहा है, उसे सही मानने की आदत है। B. क्योंकि परंपरा पर सवाल उठाना, अपनी पहचान पर सवाल उठाने जैसा लगता है। C. क्योंकि सच जानने से ज़्यादा ज़रूरी, समाज की नज़रों में सही बने रहना है। D. क्योंकि अपनी मान्यताओं की जाँच करने से कहीं आसान है, उन्हें सही मानते रहना। source https://synapses.substack.com/p/the-ghunghat-from-security-to-social
















































